लखनऊ में प्रेस की यादगार कहानी
सँगसाज़ी छपाई और आखिर में जिल्दसाजी । ये थी पुराने ज़माने की किताबों की बनावट । सँगसाज़ी मतलब पत्थर पर उल्टे हर्फ़ उकेरना ताकि काग़ज़ पर सारे लफ्ज़ सीधे दिखें । ये वो ज़माना था जब किताबें हाथ से लिखी जाती थीं । बहुत ज़्यादा हुवा तो खत्ताति या कैलीग्राफी कर के उसे कुछ थोड़े लोगों को बेच जाता था । किताबें महंगी थी तब और किताबी इल्म हासिल करना गरीबों के लिए ज़ुल्म और जुर्म दोनो था । लोग कम में खुश थे । मगर फिर एक इंसान आया जिसने ये सब बदल दिया ।
क्या बात रही होगी उस अदीब में जिसने मिर्ज़ा असदुल्लाह खान "ग़ालिब" को भी अपना दीवाना बना लिया था ।
हुलिया ऐसा था हज़रत का कि एक नजर में या तो पठान या सरदार लगते थे या फिर अलमस्त बैरागी या फ़कीर । लंबी दाढ़ी, चौड़े पाचे का पजामा सदरी या कोट जो कि मौसम के हिसाब से बदलता था । मगर जो भी थे, वो थे खालिस हिंदुस्तानी । हर मज़हब के लिए बराबर की इज़्ज़त । हर इंसान एक बराबर।
कबीर तुम कब के भये बैरागी
आदि अंत से आए जब हम,
जब से भये बैरागी
जल्में नही जब का जनम हमारा,
नही कोई जग में नांही
पाव धरण को धरती नाही
आदी अंत से लय लागी
धन्धो कार कहुकानी मेला, वही गुरु वही चैला
जब से हमने मंड मड़ायाँ
आप ही आन अकेला
सतजुग पेरी पाव पवड़ियाँ, द्वापुर लीयाँ उड़ा
त्रिताजुग में अड़बद कसियाँ
कलूम फिरीयों नव फेडा
राम भया जब टोपी सिलाई,
गोरख भया जब टीका
तासे जब का हो गया मेला
अंत से सुरत लगाई
तो हाज़रीन, ख्वातीन ओ हज़रात, हम बात कर रहे हैं मुंशी नवल किशोर भार्गव की , जिन्होंने शुरुआती तालीम हासिल की अलीगढ़ के एक मकतब में । फिर आगरे चले आये आगे की पढ़ाई करने । मगर किन्ही वजूहात के चलते उनकी पढ़ाई पूरी न हो सकी । कामकाजी ज़िन्दगी शुरू हुई सफीर-ए-आगरा में अखबारनवीस या यूं कहें कि जर्नलिस्ट के तौर पर । फिर कुछ वक़्त उन्होंने कोह-ए-नूर में पहले अस्सिस्टेंट एडिटर और फिर एडिटर के तौर पर काम किया । फिर बारी आती है जान-ए-आलम नवाब वाजिद अली शाह की पहली और आखिरी मोहब्बत - लखनऊ में आपकी आमद की ।
अल्लाह ऐ बुतो हमें दिखलाए लखनऊ
सोते में भी ये कहते हैं हम हाए लखनऊ
ये माज़ी के पन्नों में दर्ज चन्द बयान हैं जिनको ढूंढ कर आपकी खिदमत में मैं अपनी ज़बाँ में पेश कर रहा हूँ।
साल था सन 1858, जब मुंशी नवल किशोर अलीगढ़ से आगरे के रस्ते लखनऊ पहुंचे थे। 1857 की जंग के निशान अब भी बाकी थे । छपाई का ईजाद 40 साल पहले माइकल कैक्स्टन ने कर दिया था मगर उसका नाम ओ निशान हिंदुस्तान में दूर दूर तक कहीं नहीं था । बस्तील में अब तक इन्क़लाब आ चुका था मगर हिंदुस्तानियों को इसकी कोई खबर नहीँ थी । न ही कार्ल मार्क्स या लेनिन या माओ त्से तुंग की कहानियों ने अभी तक होश संभाला था । न ही किसी हिंदुस्तानी को बैरूनी मुल्कों में हो रही तरक़्क़ी का कुछ भी अता पता था । राजे महाराजों के फ़रज़न्द अपनी पुरानी पुश्तों की कहानियां अभी भी बस ज़बानी ही सुुनातेे थे। ऐसे एक इन्तशारँगेज़ माहौल में मुंशी जी ने लखनऊ के रुख़ किया।
मुंशी जी जो सियासत की खबरें वो कोह-ए-नूर में लिखा करते थे वैसा ही कुछ लखनऊ में करने की ख्वाहिश लिए लखनऊ आये थे । मगर 1857 के इंक़लाब की पहली जंग - कि जिसको एक मामूली सी बग़ावत बोल के अंग्रेज़ आज भी खारिज कर देते हैं, के बाद न राजा रहे न मुसाहिब । अब तो बस रामपुर, जामों, नायन और ऐसे ही कुछ छोटी मोटी रियासतों के नवाब या यूं कहें कि ज़मींदार रह गए थे जिनके पास इतना असबाब नहीं होता था कि हिंदुस्तान के सभी सफ़ीरों और अदीबों को एक मुश्त पनाह दे सकें । तो तय ये हुआ कि पुराने मुल्क बदर या कब्रगाहों में अपनी मज़ारों में आराम कर रहे नवाबों की तर्ज़ पर कुछ अदीबों और फ़नकारों की मदद की जाय और तब ख्याल आया उनको उस ज़माने के जिंदा नग्मा - निगारों का और खास तौर पर मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब साहब का , जिनका वज़ीफा बादशाह बहादुर शाह जफर के रंगून में मुल्क बदर होने के बाद से कमोबेश बन्द हो गई थी ।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना ।
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना ।।
बात सिर्फ अपना धंधा चमकाने की नहीं थी बात थी पूरे मुल्क में अपने किस्म की एक और आज़ादी लाने की । आज़ादी पढ़ने की, समझने की और आज़ादी कलम के ज़ोर आज़माइश की । कलम की ताक़त शमशीर की ताक़त से ज़ायद होती है अब हिंदुस्तान को ये बात समझाने की बारी थी ।
जिसकी शक्कर जितनी मीठी थे वो उतने ही अज़ीम ।
उन दिनों मिसरे उठाना भी तो कारोबार था ।
ऐसे में एक कलम के मसीहा ने शुरू किया नवल किशोर प्रिंटिंग प्रेस जो कि बड़ी खामोशी से एक नया इंक़लाब लाने वाला था । दाल रोटी मगर चलती रहनी चाहिए । नवल किशोर जी ने प्रिंटिंग प्रेस हांलाकि शुरू की थी 1858 में, मगर उनका पहला पर्चा या अखबार जिसका नाम था अवध अखबार , छपा 1859 में जो कि हफ्ते में एक बार ही छपता था । क्यों न हो । सँगसाज़ी अपने आप में काफी दुश्वार काम था और वक़्त मांगता था । आज के ब्लॉक प्रिंटिंग की तकनीक से बिल्कुल अलहदा । आज लोगों के पास ग़लती करने के ज़्यादा मौके हैं। उस वक़्त ये ग़लती महंगी पड़ती थी । एक हल्की सी हिज्जे की गलती । राम का रम श्याम का शाम या चमत्कार का ... होने का मतलब था पूरा का पूरा संग या पत्थर बदलना पड़ता था। अब हफ्ते में एक पर्चा निकालने से दाल ही पकती थी वो भी पानी वाली । जिसको दाल मिल गयी दाल उस की । तो नवल किशोर जी ने शुरू किया किताबों का कारोबार । सारी की सारी किताबों को उनकी मक़ामी ज़ुबान से दूसरी ज़ुबानों में तर्जुमा करना और लोगों तक पहुंचना । मिसाल के तौर पर श्रीमद्भागवत गीता का उर्दू तर्जुमा और क़ुरान का हिंदी तर्जुमा । मुंशी जी ने सिर्फ हिंदी और उर्दू में ही नहीं बंगाली, गुरमुखी और न मालूम कितनी ज़ुबानों में किताबें छपवाई। उन्हें हिंदुस्तान का कैक्स्टन ऐसे ही नहीं कहते।
और हां दास्तानगोई जो अब तक एक ज़ुबानी रवायत थी, उनको भी किताबों की शक्ल में लोगों तक पहुंचाया गया। दास्तानगोई जो अब तक सिर्फ रज़्म और बज़्म तक महदूद थी, उसे भी नया आयाम मिला, अय्यारी जोड़ी गई । बहुत से लोगों की हयात को भी कहानियों की शक्ल में लिखा गया।
इस तरह क़रीब पचास हज़ार किताबें लिखी और पढ़ी गई । कहते हैं, क़ुरान मजीद का तर्जुमा करते वक़्त सारे के सारे कारीगरों से वज़ू करवाया जाता था साफ कपड़े पहनने की ताकीद थी । ताकि मज़हब की अज़मत को किसी तरह की ठेस न पहुंचे। और गीता के तर्जुमे के वक़्त नहा धो कर साफ धुले हुवे कपड़े पहन कर व्रत रख कर दिन भर काम और उसके बाद शाम को सिर्फ फलाहार । ताकि धर्म का मान रहे । दीवान ए ग़ालिब से ले कर मीर तक़ी मीर और दाग़ देहलवी से ले कर बहादुर शाह ज़फ़र के दीवान छपे और बिके। आज हमको जो भी सेकंड हैंड किस्से कहानियां सुनने को मिलती हैं, उसमे बहुत सारा हाथ ये मुंशी नवल किशोर जी का है।
मुंशी जी के दो बेटे हुए - राम कुमार और तेज कुमार । दोनो ने नवल किशोर प्रेस की रवायत को आगे बढ़ाया और अपने अपने नाम के प्रेस लगवाए -रामकुमार प्रेस और तेज कुमार प्रेस ।
तकरीबन 60 साल की उम्र में मुंशी नवल किशोर ने अपने देहली कयाम के दौरान इस दुनिया को अलविदा कहा और उन्हें हिन्दू रिवाज़ के मुताबिक मुखाग्नि नहीं दी गई बल्कि उन्हें दफ्न किया गया।
तेज कुमार प्रेस जो कि हज़रतगंज के त्रिलोकनाथ रोड पर है, आज भी उसी अज़ीम शख्सियत की कहानी बयां कर रहा है जिसका नाम है मुंशी नवल किशोर ।
कभी लखनऊ जाना हो तो एक नज़र देख कर अदब के साथ सर झुकाकर निकलियेगा साहब । ये लखनऊ की सरजमीं है जो अपने आप मे कई ऐसे किस्से ऐसे दास्तान समेटे हुवे है ।
किताबों से कभी गुज़रो तो ये किरदार मिलते हैं ।
गए वक़्तों की ड्योढी पे खड़े कुछ यार मिलते हैं ।।